पातालतलमारभ्य सङ्कर्षणमुखानल: ।
दहन्नूर्ध्वशिखो विष्वग्वर्धते वायुनेरित: ॥ १० ॥
अनुवाद
यह अग्नि भगवान संकर्षण जी के मुंह से निकलती है और पाताल लोक से आरंभ करके बढ़ती जाती है। इसके शोले प्रबल वायु से प्रेरित होकर ऊपर उठते हुए चारों दिशाओं की हर वस्तु को झुलसा देते हैं।
This fire, which comes out of the mouth of Lord Sankarshan and starts from the netherworld, keeps on increasing. Its flames start rising up driven by the strong wind and it scorches every object in all the four directions.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥