श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 29: भक्ति-योग  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  11.29.6 
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश
ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुद: स्मरन्त: ।
योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्वन्न
आचार्यचैत्त्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, योगि कवि और अध्यात्म विज्ञान के पंडित लोग आपकी कृपा का गुणगान करने में पूरी तरह से असमर्थ रहे, चाहे उन्हें ब्रह्मजी जितना ही लंबा जीवन क्यों न मिल गया हो क्योंकि आप दो रूपों में प्रकट होते हैं—बाहरी रूप से आचार्य के रूप में और आंतरिक रूप से परमात्मा के रूप में—ताकि देहधारी जीव को यह निर्देश देकर मुक्ति दिलाई जा सके कि वह आपके पास कैसे पहुँचे।
 
O Lord, the Yogis, poets and those versed in the spiritual sciences could not fully express their gratitude to You even though they had a life as long as that of Brahma, because You appear in two forms, externally as an Acharya and internally as the Supersoul, directing the embodied soul to come to You for salvation.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, प्रभु कृष्ण एक भक्त के लिए प्राणों से भी दस लाख गुना अधिक प्रिय हैं। और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भले ही एक भक्त हज़ार ब्रह्मांडों के निर्माण की कुल अवधि तक भक्ति सेवा प्रदान करे, फिर भी वह प्रभु के प्रति उस ऋण का निःशोधन नहीं कर सकता है जो उन्होंने प्रभु के चरण कमलों की प्रेममयी सेवा देने के लिए उस पर किया है। प्रभु हृदय में परमात्मा के रूप में और बाह्य रूप से आध्यात्मिक गुरु के रूप में और अपने साहित्यिक अवतार के रूप में प्रकट होते हैं - भगवद्-गीता और श्रीमद-भागवतम का सर्वोच्च वैदिक ज्ञान।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)