श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 29: भक्ति-योग  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  11.29.49 
भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं
निगमकृदुपजह्रे भृङ्गवद् वेदसारम् ।
अमृतमुदधितश्चापाययद् भृत्यवर्गान्
पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उन परम पूजनीय भगवान श्री कृष्ण को नमन करता हूँ जो सर्वप्रथम और सभी जीवों में सबसे महान हैं। वेदों के रचयिता हैं और उन्होंने अपने भक्तों के भौतिक संसार के डर को नष्ट करने के लिए, एक मधुमक्खी की तरह, सभी ज्ञान और आत्म-ज्ञान के इस मधुर सार को एकत्र किया है। इस प्रकार उन्होंने अपने कई भक्तों को आनंद के समुद्र से यह अमृत प्रदान किया है और उनकी कृपा से उन्होंने इसका पान किया है।
 
I offer my obeisances unto Lord Krishna, who is the beginningless and the greatest of all beings. He is the author of the Vedas, and to destroy the fear of the material world of His devotees, He has collected like a bee this nectarous essence of all knowledge and science. Thus He has bestowed this nectar from the ocean of bliss to many of His devotees, and by His grace they have drunk it.
तात्पर्य
जैसे एक मधुमक्खी फूल को नुकसान पहुँचाए बिना उससे अमृत निकालती है, उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण वैदिक ज्ञान की सभी सूक्ष्मताओं को बिना जटिल वैदिक प्रणालियों में बाधा पहुँचाए उसे अपने अंदर समाहित कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान श्री कृष्ण, भौतिक लोगों के लिए लागू होने वाली प्रारंभिक और निम्न-स्तरीय प्रक्रियाओं को नष्ट किए बिना, खुद को ही वैदिक ज्ञान का लक्ष्य बना लेते है। इस प्रकार, श्री शुकदेव गोस्वामी, पूरे ब्रह्मांड के गुरु भगवान श्री कृष्ण को नमस्कार करते हुए इस अध्याय का समापन करते हैं।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत उनतीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)