श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 29: भक्ति-योग  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  11.29.47 
ततस्तमन्तर्हृदि सन्निवेश्य
गतो महाभागवतो विशालाम् ।
यथोपदिष्टां जगदेकबन्धुना
तप: समास्थाय हरेरगाद् गतिम् ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
इसके पश्चात्, भगवान को अपने हृदय में रखते हुए, महान भक्त उद्धव बदरिकाश्रम गये। वहाँ पर तपस्या में संलग्न होकर, उन्होंने भगवान के निजी धाम को प्राप्त कर लिया, जिसका वर्णन उन्हें ब्रह्माण्ड के एकमात्र मित्र, स्वयं भगवान कृष्ण ने किया था।
 
Thereafter, keeping God in his heart, the great devotee Uddhav went to Badarika Ashram. There, engaged in penance, he attained the personal abode of God, which was described to him by the universe's only friend, Krishna himself.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, श्री उद्धव आध्यात्मिक आकाश में द्वारका लौट आए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)