श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 29: भक्ति-योग  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  11.29.46 
सुदुस्त्यजस्‍नेहवियोगकातरो
न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुर: ।
कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके
बिभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुन: पुन: ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
जिससे उद्धव का गहरा लगाव था, उससे वियुक्त होने के अत्यधिक भय में, वे असमंजसग्रस्त हो गए और वे भगवान का दामन नहीं छोड़ पाए। अंत में, अत्यधिक पीड़ा का अनुभव करते हुए, उन्होंने बार-बार प्रभु को प्रणाम किया और अपने स्वामी की खड़ाऊँ को सिर पर रखकर वहाँ से प्रस्थान किया।
 
Uddhava was deeply afraid of being separated from those for whom he had great affection, and he was at a loss and could not leave the company of the Lord. At last, feeling great pain, he repeatedly offered obeisances unto the Lord and departed from there, carrying his master's sandals on his head.
तात्पर्य
श्रीमद-भागवतम् के अनुसार (3.4.5) उद्धव जब बद्रीकाश्रम जा रहे थे, तो उन्होंने प्रभास की भगवान की यात्रा के बारे में सुना। पलटकर, भगवान कृष्ण का पीछा करते हुए, उन्होंने यदु वंश की वापसी के तुरंत बाद अकेले ही भगवान को देखा। भगवान के व्यक्तित्व (मैत्रेय के साथ, जो अभी-अभी आए थे) द्वारा फिर से दयापूर्वक निर्देश दिए जाने के बाद, उद्धव ने सत्य के बारे में अपने ज्ञान को फिर से जागृत होते हुए महसूस किया और फिर भगवान के आदेश से, वे अपने रास्ते पर निकल पड़े।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)