दाशार्हों, वृष्णियों, अन्धकों और सात्वतों के परिवारों के लिए मेरे स्नेह की कड़ी रस्सी, जिसे आपने अपनी माया के द्वारा शुरू में मेरी रचना के उद्देश्य से मेरे ऊपर डाल दिया था, अब आत्म-ज्ञान के दिव्य हथियार से कट गई है।
The firmly tied rope of my affection for the families of the Daśarhas, the Vṛṣṇīs, the Andhakas and the Satvatas—the rope which You had placed upon me in the beginning by Your Maya in order to bring about Your creation—has now been cut by the weapon of transcendental Self-knowledge.
तात्पर्य
यद्यपि इस छंद में वर्णित परिवारों के सदस्य भगवान कृष्ण के शाश्वत सहयोगी हैं और इस प्रकार स्नेह के उचित पात्र हैं, श्री उद्धव ने उन्हें शुद्ध भक्तों के बजाय अपने व्यक्तिगत संबंधियों के रूप में माना था। भगवान की माया से प्रभावित होकर, उद्धव ने इन वंशों की समृद्धि और विजय की कामना की थी। लेकिन अब, भगवान कृष्ण के निर्देशों को सुनकर, उन्होंने फिर से अपने मन को केवल भगवान कृष्ण पर ही स्थिर कर लिया है, और इस प्रकार वे अपने तथाकथित परिवार के सदस्यों को किसी भी सांसारिक अवधारणा के बिना - भगवान के शाश्वत सेवकों के रूप में मानते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥