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bhagavat 11.29.32: जब जिज्ञासु व्यक्ति इस ज्ञान को आत्मसात कर लेता है, तो उसे और कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। आख़िरकार, जिसने सबसे स्वादिष्ट अमृत का पान किया है, वह प्यासा कैसे रह सकता है?   |   bhagavat अध्याय 11.29: भक्ति-योग   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 29: भक्ति-योग  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.29.32 
नैतद् विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते ।
पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जब जिज्ञासु व्यक्ति इस ज्ञान को आत्मसात कर लेता है, तो उसे और कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। आख़िरकार, जिसने सबसे स्वादिष्ट अमृत का पान किया है, वह प्यासा कैसे रह सकता है?
 
When the inquisitive person understands this knowledge, there is nothing left for him to know. After all, can someone who has drunk the most delicious nectar ever remain thirsty?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)