अथात आनन्ददुघं पदाम्बुजं
हंसा: श्रयेरन्नरविन्दलोचन ।
सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभि-
स्त्वन्माययामी विहता न मानिन: ॥ ३ ॥
अनुवाद
अतः हे कमल नयन वाले ब्रह्माण्ड के स्वामी, हंस जैसे व्यक्ति खुशी-खुशी आपके उन चरणकमलों की शरण में आते हैं, जो सभी दिव्य आनंद के स्रोत हैं। लेकिन जो लोग अपने योग और कर्म की उपलब्धियों का घमंड करते हैं, वे आपकी शरण में नहीं आ पाते और आपकी मायाशक्ति द्वारा परास्त हो जाते हैं।
Therefore, O lotus-eyed Lord of the universe, the swan-like beings gladly take refuge in Your feet, which are the source of all transcendental bliss. But those who are proud of their achievements in yoga and action are unable to take refuge in You and are defeated by Your illusory power.
तात्पर्य
श्री उद्धव यहाँ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कोई भी व्यक्ति केवल भगवान के व्यक्तित्व का आश्रय लेकर आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर सकता है। जो लोग ऐसा करते हैं, उन्हें हंसाह कहा जाता है, जो सबसे अधिक विवेकशील मनुष्य होते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक सुख के वास्तविक स्रोत, भगवान के चरण-कमलों का पता लगाने में सक्षम होते हैं। योग-कर्मभिः शब्द इंगित करता है कि जो लोग रहस्यवादी योग या सामान्य भौतिक प्रयास के क्षेत्र में उपलब्धियों पर आकर्षित होते हैं या उन पर गर्व करते हैं, वे भगवान के आज्ञाकारी समर्पण के महान लाभ की सराहना नहीं कर सकते। आम तौर पर योगी और काम करने वाले लोग अपनी तथाकथित उपलब्धियों पर गर्व करते हैं और प्रभु की तुलना में अपने स्वयं के प्रयासों के प्रति अधिक आकर्षित होते हैं। भगवन के चरणो में विनम्रता से शरण लेने से, व्यक्ति कृष्ण-चेतना के मार्ग पर आसानी से और जल्दी से आगे बढ़ सकता है और गृह वापस, परमात्मा के पास वापस जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥