एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।
यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ २२ ॥
अनुवाद
यह विधि बुद्धिमानों की परम बुद्धि और चतुरों की परम चतुराई है, क्योंकि इसका अनुसरण करके मनुष्य इस जीवन में ही मुझ, शाश्वत सत्य को प्राप्त करने हेतु अस्थायी और असत्य का उपयोग कर सकता है।
This method is the supreme wisdom of the wise and the cleverness of the most clever, because by following it, a person can use the mortal and the untruth to attain Me, the eternal Truth, in this very life.
तात्पर्य
जैसा की इस अध्याय में समझाया गया है, व्यक्ति जो अपनी प्रतिष्ठा ईश्वर की सेवा में चाहता है, वो बुद्धिमान या कुशल नहीं माना जा सकता। ठीक ऐसे ही, व्यक्ति जो एक कुशल विद्वान बनने का इच्छुक है वह सबसे बुद्धिमान नहीं है। और न ही व्यक्ति जो पैसे जमा करने में माहिर है। यहाँ भगवान् बताते हैं की सबसे बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति भक्त है जो अपने सांसारिक, काल्पनिक भौतिक शरीर और संपत्ति उसे विशुद्ध प्रेम से बिना स्वार्थ के भावना के अर्पित करता है। इस प्रकार भक्त शाश्वत परम सत्य को प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, असली बुद्धिमानी भगवान कृष्ण के समक्ष समर्पण करना है, बिना स्वार्थ और पाखंड के। यह भगवान की राय है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥