श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 29: भक्ति-योग  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  11.29.16 
विसृज्य स्मयमानान् स्वान् द‍ृशं व्रीडां च दैहिकीम् ।
प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने साथियों की हँसी की परवाह न करते हुए देह के मोह और उससे जुड़ी शर्म को त्याग दे। उसे कुत्तों, चंडालों, गायों और गधों तक को दंडवत प्रणाम करना चाहिए, ठीक जैसे कोई डंडा ज़मीन पर गिरता है।
 
A man should abandon the body-soul consciousness and the worries attached to it, without caring about the ridicule of his friends. He should bow down on the ground like a staff in front of dogs, chandalas, cows and even donkeys.
तात्पर्य
सब प्राणियों में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को देखने का अभ्यास करना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी भक्तों को घास के एक ब्लेड से भी नीचा समझने और एक पेड़ से अधिक सहिष्णु होने की सलाह दी। इस तरह की विनम्र स्थिति में, भगवान के प्रति शुद्ध भक्ति सेवा पर मुकदमा चलाने में कोई विचलित नहीं होगा। एक भक्त मूर्खतापूर्ण ढंग से यह नहीं सोचता है कि गाय या गधा भगवान है, बल्कि भक्त सभी प्राणियों में सर्वोच्च भगवान को देखता है, और इस उच्चतर, आध्यात्मिक स्तर पर वह भेदभाव नहीं करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)