श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  11.28.9 
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा ।
आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा नि:सङ्गो विचरेदिह ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
प्रत्यक्ष अनुभव, तर्कसंगत निष्कर्ष, शास्त्रों के प्रमाण और व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से, एक व्यक्ति को यह जान लेना चाहिए कि इस संसार की एक शुरुआत और एक अंत है, इसलिए यह परम सत्य नहीं है। इस प्रकार, एक व्यक्ति को इस संसार में आसक्ति के बिना रहना चाहिए।
 
Through direct experience, logical deduction, scriptural evidence and self-realization, man should know that this world has a beginning and an end, and hence it is not the ultimate truth. In this way, man should live in this world without any attachment.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार दो मुख्य प्रकार की भौतिक द्वंद्वता होती है। पहली द्वंद्वता यह है कि व्यक्ति सांसारिक अच्छाई और बुराई, सुंदरता और कुरूपता, अमीरी और गरीबी आदि को देखता है। दूसरी द्वंद्वता यह है कि व्यक्ति संपूर्ण भौतिक जगत को परमेश्वर से अलग या स्वतंत्र मानता है। पहली द्वंद्व, जो कि विपरीतताओं की है, समय के प्रभाव से नष्ट हो जाती है, और दूसरी द्वंद्व, जो कि पृथक्ता की, मात्र एक भ्रम होता है। जो व्यक्ति इस संसार की क्षणभंगुरता और मायावी प्रकृति के प्रति पूर्णतः आश्वस्त होता है, वह इस संसार में बिना आसक्ति के स्वतंत्र रूप से विचरण करता है। ऐसा व्यक्ति भगवान की सभी प्रकार की भक्ति में संलग्न होने के बावजूद, कभी भी उलझता नहीं है और आध्यात्मिक चेतना में प्रसन्न और संतुष्ट रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)