एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम् ।
न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ८ ॥
अनुवाद
जिस व्यक्ति ने मेरे द्वारा यहाँ विस्तृत सैद्धांतिक ज्ञान और अनुभवी ज्ञान को समझा है, वह भौतिक निंदा या प्रशंसा से प्रभावित नहीं होता। वह इस दुनिया में सूरज की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता रहता है।
He who has thoroughly understood the method of being established in theoretical and experienced knowledge described here by me, does not indulge in material criticism or praise. He moves freely everywhere in this world like the sun.
तात्पर्य
हर एक जीवित प्राणी परमेश्वर से उत्पन्न होता है और इस तरह वो स्वाभाविक रुप से परिपूर्ण है। लेकिन जब कोई भौतिक अच्छाई और बुराई का प्रशंसा या उसका निंदा करना चाहता है, अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए, भगवान के बारे में वो ज्ञान उससे छिप जाता है। किसी भी शुद्ध भक्त को भौतिक भ्रम के किसी भी पहलु से न प्यार करना चाहिए न नफरत करनी चाहिए; उन्हें बस कृष्ण की सेवा के लिए जो भी अनुकूल हो वहीं स्वीकार करना चाहिए और हर उस चीज को नकार देना चाहिए जो प्रतिकूल हो, एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन पर चलते हुए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥