श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  11.28.6-7 
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभु: ।
त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वर: ॥ ६ ॥
तस्मान्न ह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपित: ।
निरूपितेऽयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि ।
इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
एकमात्र परमात्मा ही इस जगत के परम नियंता और सृष्टिकर्ता हैं, इसलिए केवल वही सृष्टि के रचयिता भी हैं। उसी प्रकार, जो संपूर्ण अस्तित्व की आत्मा हैं, वही पालन करते हैं और पालित भी होते हैं; हरते हैं और हर भी जाते हैं। यद्यपि परमात्मा प्रत्येक वस्तु से और अन्य सभी से भिन्न हैं, पर कोई अन्य जीव उनसे पृथक रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता। तीन प्रकार की प्रकृति जो उनमें दिखाई देती है, उसका कोई वास्तविक आधार नहीं है। बल्कि, आपको यह समझना चाहिए कि तीन गुणों वाली यह प्रकृति उनकी मायाशक्ति का ही परिणाम है।
 
The Supreme Soul alone is the supreme controller and creator of this universe, and therefore He alone has created it. Similarly, the Self of the universe nurtures and is nurtured; He destroys and is destroyed. Although the Supreme Soul is separate from everything and everyone else, no other being can be determined as separate from Him. The threefold manifestation of nature seen within Him has no real basis. Rather, you must understand that this nature with three modes is the result of His illusory power.
तात्पर्य
परम सत्य, भगवान श्री कृष्ण, अपनी बाहरी शक्ति का विस्तार करते हैं और इस प्रकार भौतिक ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। सूर्य ग्लोब और उसकी विस्तारित किरणों की तरह, भगवान और उनकी विस्तारित शक्ति एक साथ एक और भिन्न हैं। यद्यपि वातानुकूलित आत्माओं के लिए भौतिक द्वैत प्रकृति के तरीकों पर आधारित प्रतीत होता है, संपूर्ण भौतिक अभिव्यक्ति वास्तव में भगवान से अलग नहीं होती है और एक अंततः आध्यात्मिक प्रकृति की होती है। प्रकृति के तरीके ज्ञानेंद्रियों की वस्तुएँ, देवता, मनुष्य, पशु, मित्र, शत्रु और अन्य बहुत कुछ बनाते हैं। लेकिन वास्तव में, सब कुछ केवल सर्वोच्च भगवान की शक्ति का विस्तार है। मूर्खतापूर्ण ढंग से, वातानुकूलित आत्मा प्रकृति को नियंत्रित करने की कोशिश करती है, लेकिन खुद भगवान, उस प्रकृति से अलग नहीं होने के कारण, उसके एकमात्र सच्चे मालिक हैं। कई जगहों पर श्रीमद्-भागवतम में मकड़ी द्वारा अपने मुंह से धागा निकालकर अपना जाल बनाते हुए उदाहरण दिए गए हैं। इसी तरह, अपनी शक्ति के माध्यम से भगवान भौतिक दुनिया को प्रकट करते हैं, इसे बनाए रखते हैं और अंततः इसे अपने भीतर वापस ले लेते हैं। यद्यपि भगवान हर किसी और हर चीज से ऊपर, ईश्वर का अद्वितीय सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, फिर भी वे एक साथ और अविश्वसनीय रूप से हर चीज से अलग नहीं हैं। इसलिए यह स्वयं भगवान ही हैं जो प्रकट होते हैं जब भगवान बनाते हैं, यह स्वयं भगवान हैं जो बनाए रखते हैं जब भगवान बनाए रखते हैं, और यह स्वयं भगवान ही हैं जो विनाश के समय वापस ले लिए जाते हैं। यद्यपि भगवान अपने आध्यात्मिक निवास और अपनी भौतिक सृष्टि दोनों से अलग नहीं हैं, फिर भी आध्यात्मिक निवास, वैकुण्ठ, हमेशा भौतिक अभिव्यक्ति से श्रेष्ठ होता है। पदार्थ और आत्मा दोनों भगवान की ऊर्जाएँ हैं, फिर भी आध्यात्मिक ऊर्जा को आनंद और ज्ञान के शाश्वत रूपों में ढाला जाता है, जबकि पदार्थ के अस्थायी रूप वातानुकूलित आत्माओं के लिए अज्ञानता और निराशा के प्रतीक हैं जो उन्हें पसंद करते हैं। परम भगवान स्वयं सभी सुखों के भंडार हैं और इस प्रकार अपने भक्तों के प्रिय हैं। यह अनुमान कि भगवान हमें पूर्ण सुख नहीं दे सकते, उनकी गलत पहचान के कारण प्रकृति के भौतिक तरीकों के उत्पाद के रूप में है। नतीजतन, हम माया के घातक आलिंगन में झूठी खुशी का पीछा करते हैं और इस तरह भगवान कृष्ण के साथ अपने शाश्वत प्रेममय संबंध से भटक जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)