श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  11.28.5 
छायाप्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिण: ।
एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि छायाएँ, प्रतिध्वनियाँ और मृगमरीचिकाएँ केवल वास्तविक चीजों के भ्रामक प्रतिबिंब हैं, फिर भी ये प्रतिबिंब कुछ सार्थक या समझने योग्य धारणा का आभास कराते हैं। इसी प्रकार, यद्यपि बद्ध आत्मा की भौतिक शरीर, मन और अहंकार के साथ पहचान भ्रामक है, लेकिन यह पहचान मृत्यु तक उसके भीतर भय उत्पन्न करती रहती है।
 
Although shadows, echoes and mirages are only illusory images of real objects, these images produce a semblance of something meaningful or knowable. Similarly, although the identification of the conditioned soul with the body, mind and ego is illusory, this identification continues to create fear in him until death.
तात्पर्य
यद्यपि छाया, प्रतिध्वनि व मृगमरीचिका मात्र वास्तविक तत्व के प्रतिबिंब है, किंतु वे व्यक्तियों में प्रबल भावनाएँ उत्पन्न करते है जो उन्हें वास्तविक मान लेते हैं। इसी प्रकार, एक सशर्त आत्मा अपने शरीर, मन व अहंकार को वास्तविक मानकर भय, काम, क्रोध व आशा जैसी भावनाओं से ग्रसित होता है। व्यावहारिक उदाहरणों से इस तरह यह दिखाया जाता है कि काल्पनिक वस्तुएँ भी प्रबल भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकती हैं। अंततः हमारी भावनाओं को सर्वोच्च भगवान में समाहित हो जाना चाहिए, जो सत्य है। जब कोई भगवान के चरणों की शरण लेता है, तो उसका भय हमेशा के लिए दूर हो जाता है। इस तरह वह मुक्ति प्राप्त जीवन की पवित्र भावनाओं का अनुभव कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)