न हि तत् कुशलादृत्यं तदायासो ह्यपार्थक: ।
अन्तवत्त्वाच्छरीरस्य फलस्येव वनस्पते: ॥ ४२ ॥
अनुवाद
दिव्य ज्ञान में पटु लोगों के लिए ये शारीरिक सिद्धियाँ बहुत महत्वपूर्ण नहीं होती हैं। वे ऐसे प्रयासों को व्यर्थ मानते हैं क्योंकि आत्मा तो वृक्ष के सदृश स्थायी है, लेकिन शरीर वृक्ष के फल के सदृश नष्ट होने वाला है।
Those who are versed in divine knowledge do not attach much importance to the physical accomplishment of this yoga. Indeed, they consider the effort made for such accomplishment to be futile because the soul is permanent like a tree but the body is destructible like the fruit of the tree.
तात्पर्य
यहाँ दिया गया उदाहरण एक पेड़ का है जो मौसमी रूप से फल देता है। फल बहुत कम समय के लिए रहता है, जबकि पेड़ हजारों सालों तक रह सकता है। इसी तरह, आत्मा शाश्वत है, जबकि भौतिक शरीर, भले ही यथासंभव लंबे समय तक संरक्षित किया गया हो, अपेक्षाकृत जल्दी नष्ट हो जाता है। शरीर को शाश्वत अस्तित्व वाली आत्मा के साथ कभी भी नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जो वास्तव में बुद्धिमान हैं, जिनके पास वास्तव में आध्यात्मिक ज्ञान है, वे भौतिक रहस्यमय पूर्णताओं में रुचि नहीं रखते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥