श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.28.4 
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुन: कियत् ।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
जो कुछ भी भौतिक शब्दों द्वारा व्यक्त किया जाता है या भौतिक मन द्वारा विचार किया जाता है, वह परम सत्य नहीं है। तो फिर, इस द्वैत के क्षणभंगुर संसार में, वास्तव में क्या अच्छा या बुरा है और इस तरह के अच्छे और बुरे की सीमा को कैसे मापा जा सकता है?
 
Whatever is expressed in material words or contemplated by the mind is not the ultimate truth. So in this immaterial world of duality, what is really good or bad and how can the amount of such good and bad be measured?
तात्पर्य
वास्तविक सत्य सर्वोच्च व्यक्ति है जिसमें से हर चीज़ उत्पन्न होती है, जिसके द्वारा सब कुछ बना रहता है और जिसमें वह विलीन हो कर शांत हो जाता है। भौतिक प्रकृति पूर्ण सत्य की झलक है, और भौतिक प्रकृति के तरीकों में पारस्परिक क्रिया द्वारा अपरिमित तरह के पदार्थ अलग, स्वतंत्र सत्य प्रतीत होते हैं। माया, भ्रम, संशर्त आत्मा को पूर्ण सत्य से विचलित करता है और उसके मन को पदार्थ के चकाचौंधपूर्ण प्रदर्शन में लगाए रखता है, जो कि अंततः पूर्ण सत्य से भिन्न नहीं है, क्योंकि यह उसका स्राव है। सर्वोच्च भगवान से अलग अच्छे और बुरे का भाव उस अच्छे और बुरे सपने जैसा है जो सोने वाले व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए जाते हैं। अच्छे और बुरे सपने समान रूप से असत्य हैं। इसी तरह, भौतिक अच्छे और बुराई का सर्वोच्च व्यक्ति से अलग कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है।

सर्वोच्च भगवान हर जीवित इकाई का शुभचिंतक है, और इसलिए उसके आज्ञा का पालन करना अच्छा है, जबकि उसके आज्ञा की अवहेलना करना बुरा है। भगवान कृष्ण ने वर्णाश्रम-धर्म नामक एक पूर्ण सामाजिक और व्यावसायिक प्रणाली बनाई है, और भगवान ने आगे श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य साहित्य में पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान दिया है। भगवान कृष्ण के आज्ञा का पालन करने से मानव समाज में पूर्ण सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक सफलता आएगी। हमें सर्वोच्च व्यक्तित्व के आज्ञा के बाहर स्वयंभू अच्छे को मूर्खतापूर्वक नहीं देखना चाहिए। ऐसे आज्ञा को ईश्वर का कानून कहा जाता है और धर्म का सार या तत्व है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)