श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  11.28.38 
योगिनोऽपक्व‍योगस्य युञ्जत: काय उत्थितै: ।
उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधि: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
अपने अभ्यास में अभी भी परिपक्व न होने वाले प्रयत्नशील योगी का शरीर कभी-कभी अनेक बाधाओं की चपेट में आ सकता है। इसलिए निम्नलिखित विधि सुझाई जाती है।
 
The body of a striving yogi who has not yet matured in his practice can sometimes be vulnerable to various disturbances. Therefore the following method is recommended.
तात्पर्य
ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए, भगवान अब योगियों को निर्देश देते हैं जिनके शरीर रोग या अन्य बाधाओं से परेशान हो सकते हैं। वे निम्न योगी जो शरीर और शारीरिक व्यायाम से जुड़े होते हैं, वे अक्सर अपनी प्राप्ति में अधूरे होते हैं, और इस प्रकार भगवान यहाँ उन्हें कुछ सहायता प्रदान करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)