एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले ।
आत्मनृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि ॥ ३६ ॥
अनुवाद
आत्मा में जो भी द्वैतता दिखती है वो केवल मन के भ्रम के कारण है। बेशक, ऐसा द्वैत केवल आत्मा से अलग विचार करने पर ही दिखाई देता है जो वास्तव में सही नहीं है।
Any superficial duality experienced in the soul is only a doubt of the mind. Of course, there is no basis for such an imagined duality to stand apart from one's own soul.
तात्पर्य
जैसा कि इस अध्याय के 33 वें श्लोक में बताया गया है, नित्य आत्मा न तो धारण की जाती है और न ही खोई जाती है, क्योंकि प्रत्येक जीवित इकाई एक नित्य वास्तविकता है। यहाँ "विकल्प" या "द्वैत" शब्द आत्मा के उस गलत विचार को संदर्भित करता है जो आंशिक रूप से स्थूल शरीर या सूक्ष्म मन के रूप में पदार्थ से बना है। इस प्रकार मूर्ख लोग भौतिक शरीर या मन को आत्मा का एक आंतरिक या मूलभूत घटक मानते हैं। वास्तव में जीवित इकाई शुद्ध आत्मा है, जिसमें पदार्थ की कोई मिलावट नहीं है। परिणामस्वरूप, मिथ्या अहंकार, जो पदार्थ के साथ गलत पहचान से उत्पन्न होता है, शुद्ध आत्मा पर थोपा गया एक गलत पहचान है। अहंकार की भावना, या "मैं हूँ" - दूसरे शब्दों में, किसी की व्यक्तिगत पहचान की भावना - आत्मा से आती है, क्योंकि ऐसी आत्म-जागरूकता का कोई अन्य संभावित आधार नहीं है। अपने अहंकार की झूठी भावना का अध्ययन करके, व्यक्ति विश्लेषणात्मक रूप से समझ सकता है कि एक शुद्ध अहंकार है, जिसे "अहं ब्रह्मास्मि", "मैं शुद्ध आत्मा हूं" शब्दों द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसी तरह से आसानी से समझा जा सकता है कि एक सर्वोच्च आत्मा है, भगवान का व्यक्तित्व, जो हर चीज का सर्वज्ञ नियंत्रक है। कृष्ण चेतना में ऐसी समझ पूर्ण ज्ञान का गठन करती है, जैसा कि यहाँ भगवान द्वारा वर्णित किया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥