श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  11.28.35 
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो
महानुभूति: सकलानुभूति: ।
एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे
येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
परमेश्वर स्वयं प्रकाशित, जन्मरहित और अपरिमेय हैं। वे शुद्ध पारलौकिक चेतना हैं और प्रत्येक वस्तु को समझते हैं। वे अद्वितीय हैं और सामान्य शब्दों के बंद होने के बाद ही उनकी अनुभूति होती है। उनके द्वारा वाणी की शक्ति और जीवन शक्ति गति में आती है।
 
The Supreme Lord is self-illuminated, unborn and unfathomable. He is pure divine consciousness and experiences everything. He is unique and can be experienced only when ordinary words fail. Through Him speech and life are set in motion.
तात्पर्य
सर्वोच्च प्रभु स्वयं-प्रकाश, स्वयं-प्रकट है, जबकि व्यक्तिगत जीवित सत्ता उनके द्वारा प्रकट होते हैं। प्रभु अजन्मा हैं, लेकिन जीवित सत्ता, भौतिक, डिज़ाइन किए गए आवरणों के कारण, सशर्त जीवन में जन्म लेता है। प्रभु अथाह हैं, सर्वव्यापी हैं, जबकि जीवित सत्ता स्थानीयकृत है। सर्वोच्च प्रभु महानुभूति हैं, चेतना की समग्रता हैं, जबकि जीवित सत्ता चेतना की एक छोटी सी चिंगारी है। प्रभु सकलानुभूति हैं, सर्वज्ञ हैं, जबकि जीवित सत्ता केवल अपने सीमित अनुभव के बारे में जानता है। सर्वोच्च प्रभु एक हैं, जबकि जीवित संस्थाएं असंख्य हैं। प्रभु और स्वयं के बीच इन सभी विरोधाभासों को ध्यान में रखते हुए, हमें मूर्ख भौतिक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की तरह समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, जो अपने महत्वहीन मानसिक अटकलों और शब्द जुगलबंदी से इस दुनिया की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए संघर्ष करते हैं। हालाँकि भौतिक शोध के माध्यम से भौतिक प्रकृति के कुछ स्थूल नियमों की खोज की जा सकती है, लेकिन ऐसे क्षुद्र प्रयासों से परम सत्य को प्राप्त करने की कोई आशा नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)