श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.28.33 
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र-
मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग ।
निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव
न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
प्राकृतिक गुणों की गतिविधियों से विविध रूपों में फैली भौतिक अज्ञानता को बद्ध आत्मा गलती से स्वयं के समान मान लेती है। लेकिन हे उद्धव, आध्यात्मिक ज्ञान की साधना से यही अज्ञान मुक्ति के समय नष्ट हो जाता है। दूसरी ओर, शाश्वत आत्मा को कभी ग्रहण नहीं किया जा सकता और न ही त्यागा जा सकता है।
 
The conditioned soul mistakenly accepts material ignorance, which is expanded into various forms by the actions of the natural modes, as the Self. But this ignorance, O Uddhava, vanishes at the time of liberation by the cultivation of spiritual knowledge. On the other hand, the eternal Self can neither be grasped nor discarded.
तात्पर्य
यहां इस बात पर जोर दिया गया है कि चिरस्थायी आत्मा को कभी भी भौतिक पदनाम के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता है या थोपा नहीं जाता है, न ही इसे कभी त्यागा जाता है। जैसा कि भगवद गीता में बताया गया है, आत्मा सदैव एक ही रहती है और रूपांतरण से नहीं गुजरती है। हालाँकि, प्रकृति के गुण व्यक्ति की पिछली फलदायी गतिविधियों के परिणामस्वरूप स्थूल भौतिक शरीर और सूक्ष्म मन का निर्माण करते हैं, और ये स्थूल और सूक्ष्म शरीर आत्मा पर थोपे जाते हैं। इस प्रकार जीव न तो आत्मा को ग्रहण कर सकता है और न ही अस्वीकार कर सकता है, जो कि एक शाश्वत तथ्य है। बल्कि, उसे यहाँ बताए अनुसार आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर भौतिक चेतना की घोर अज्ञानता को त्याग देना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)