यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं
नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् ।
न मन्यते वस्तुतया मनीषी
स्वाप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३२ ॥
अनुवाद
यद्यपि एक परम आत्मा कभी-कभी अपवित्र वस्तु या कार्य को देख सकता है, परन्तु वह उसे वास्तविक नहीं मानता। बुद्धिमान व्यक्ति मायावी भौतिक द्वैत पर आधारित अशुद्ध इंद्रिय-विषयों को तार्किक रूप से समझकर उन्हें सत्य से बिल्कुल विपरीत और अलग मानता है, ठीक उसी तरह जैसे नींद से जागने वाला व्यक्ति अपने फीके सपने को देखता है।
Although the self-realized soul may sometimes see an impure object or action, he does not accept it as Real. Reasoning out the impure sense-objects as based on illusory material duality, the wise man regards them as utterly opposite and separate from Reality, just as a man awakened from sleep views his vague dreams.
तात्पर्य
एक सामान्य व्यक्ति स्वप्न के अनुभव और अपने वास्तविक जीवन के बीच स्पष्ट रूप से अंतर कर सकता है। इसी प्रकार एक मनीषी, या बुद्धिमान व्यक्ति, भगवान की मायावी ऊर्जा की रचनाओं के रूप में प्रदूषित भौतिक इंद्रिय वस्तुओं को स्पष्ट रूप से महसूस कर सकता है और तथ्यात्मक वास्तविकता नहीं। यह साक्षात बुद्धि की व्यावहारिक परीक्षा है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥