श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.28.30 
करोति कर्म क्रियते च जन्तु:
केनाप्यसौ चोदित आनिपातात् ।
न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि
निवृत्ततृष्ण: स्वसुखानुभूत्या ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
सामान्य जीव भौतिक कर्म करता है और उस कर्म के परिणाम से स्वरूप बदलता रहता है। इस तरह वह विभिन्न इच्छाओं से प्रेरित होकर मृत्यु तक कर्म करता रहता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति अपने वास्तविक आनंद का अनुभव करके भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है और फल की इच्छा से कर्म नहीं करता।
 
The ordinary living entity performs material actions and is transformed by the results of such actions. Thus, motivated by various desires, he continues to perform fruitive actions until his death. But the wise man, by continuing to experience his natural bliss, abandons all material desires and does not engage in fruitive actions.
तात्पर्य
स्त्रियों से यौन-सहवास से पुरुष बार-बार स्त्री रूप का आनंद लेने को प्रेरित होता है, और वस्तुत: वह मृत्यु के क्षण तक वासनापूर्ण बना रहता है। इसी तरह, परिवार और मित्रों के साथ जुड़ने से भौतिक मोह का बंधन बहुत मजबूत हो जाता है। इस प्रकार, कामुक कार्य की प्रतिक्रियाएँ किसी को भौतिक हार के चक्र में और अधिक बाँधती हैं। लेकिन एक विद्वान व्यक्ति, जो अपने हृदय के भीतर परमेश्‍वर के संपर्क में है, भौतिक कार्य की अंतिम निराशा और पापपूर्ण गतिविधियों के परिणामस्वरूप भविष्य के जीवन में सूअर या कुत्ते के गर्भ में प्रवेश करने के खतरे को महसूस करता है। आत्म-साक्षात्कार के मंच पर स्वयं को संसार का उपभोक्ता नहीं मानता। बल्कि, वह पूरे ब्रह्मांड को भगवान की शक्ति का एक तुच्छ विस्तार मानता है - और खुद को भगवान का विनम्र सेवक।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)