श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  11.28.3 
तैजसे निद्रयापन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतन: ।
मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्वन्नानार्थद‍ृक् पुमान् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
जिस तरह साकार आध्यात्मिक आत्मा की इंद्रियां स्वप्न देखने के भ्रम या गहरी नींद जैसे मृत्यु की स्थिति से परास्त हो जाती हैं, ठीक उसी तरह भौतिक द्वैत का अनुभव करने वाले व्यक्ति को भ्रम और मृत्यु का सामना करना पड़ता है।
 
Just as the senses of the embodied soul are overcome by the illusion of dreaming or a death-like deep sleep, so the person experiencing material duality is faced with attachment and death.
तात्पर्य
यहाँ भौतिक इन्द्रियों को तैंजस इसलिए कहा गया है क्योंकि वे सद्भाव से प्रेरित मिथ्या अहंकार से उत्पन्न होते हैं। मिथ्या अहंकार द्वारा प्रेरित होकर, व्यक्ति ईश्वर के व्यक्तित्व के बिना भौतिक दुनिया का सपना देखता है और प्रकृति पर शासन करने, उसके संसाधनों का दोहन करने की योजना बनाता है। आधुनिक नास्तिक वैज्ञानिकों ने इस झूठे अहंकार को एक बारीक कला के रूप में विकसित किया है और खुद को प्रकृति की बाधाओं पर विजय पाने वाले महान नायक और अनिवार्य सर्वज्ञता की ओर बढ़ते हुए कल्पना करते हैं। ऐसे स्वप्निल भौतिकवादियों को बार-बार प्रकृति के नियमों की कुचल प्रतिक्रियाओं से स्तब्ध किया जाता है, और उनकी अभिमानी, अज्ञेय सभ्यताएं बार-बार विश्व युद्धों, प्राकृतिक आपदाओं और ब्रह्मांडीय स्थिति की हिंसक स्थितियों से नष्ट हो जाती हैं।

एक सरल स्तर पर, सभी वातानुकूलित आत्माएँ लैंगिक आकर्षण से मोहित हो जाती हैं और इस तरह भौतिक समाज, मित्रता और प्रेम के भ्रम से बंध जाती हैं। वे खुद को भौतिक प्रकृति के अद्भुत आनंद लेने वाले होने की कल्पना करते हैं, जो अचानक उनके खिलाफ हो जाती है और उन्हें मार देती है जैसे "वश में किया हुआ" जानवर जो अचानक अपने मालिक पर हमला कर देता है और उसे मार देता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)