श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  11.28.27 
तथापि सङ्ग: परिवर्जनीयो
गुणेषु मायारचितेषु तावत् ।
मद्भ‍‍क्तियोगेन द‍ृढेन यावद्
रजो निरस्येत मन:कषाय: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
फिर भी, जब तक कि मनुष्य दृढ़ता से मेरी भक्ति का अभ्यास करके अपने मन से भौतिक काम-वासना के मैल को पूरी तरह से नहीं हटा देता, तब तक उसे इन भौतिक गुणों की संगति करने में सावधानी बरतनी चाहिए जो मेरी मायाशक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं।
 
Nevertheless, unless a person firmly practices My devotional service and completely removes from his mind the contamination of material sensuality, he must be cautious in associating with these material modes which are produced by My illusory energy.
तात्पर्य
इस श्लोक में 'तथापि' शब्द यह इंगित करता है कि भले ही भौतिक प्रकृति परम प्रभु से भिन्न नहीं है (जैसा कि इस अध्याय में विस्तृत रूप से वर्णित है), जो अभी भी भौतिक इच्छाओं पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया है, उसे कृत्रिम रूप से भौतिक चीजों के साथ नहीं जुड़ना चाहिए, यह घोषित करते हुए कि वे प्रभु से भिन्न नहीं हैं। इस प्रकार कृष्ण चेतन बनने की आकांक्षा रखने वाले को महिलाओं के साथ घनिष्ठता नहीं करनी चाहिए, यह दावा करते हुए कि वे भगवान से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि सबसे उन्नत भक्तों की ऐसी नकल करके व्यक्ति इंद्रियतृप्त करने वाला बन जाएगा। एक नौसिखिया भक्त जो खुद को मुक्त मानता है, वह झूठे अभिमान से अपने पद पर गर्व करने के लिए वासना से प्रेरित हो जाता है, और इस प्रकार वह प्रभु की भक्ति सेवा की वास्तविक प्रक्रिया की उपेक्षा करता है। व्यक्ति को उच्च अधिकारियों के निर्देशन में प्रभु की प्रेममयी सेवा में दृढ़ और स्थिर रहना होगा; तब कृष्ण चेतना में प्रगति आसान और उदात्त होगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)