Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 11.28.23: इस प्रकार, विवेकपूर्ण ढंग से परब्रह्म की अनूठी स्थिति को समझते हुए, मनुष्य को पदार्थ के साथ अपनी गलत पहचान का कुशलतापूर्वक खंडन करना चाहिए और आत्मा की पहचान के बारे में सभी संदेहों को दूर करना चाहिए। आत्मा के स्वाभाविक आनंद से संतुष्ट होकर मनुष्य को भौतिक इंद्रियों के वासनापूर्ण कार्यों से बचना चाहिए। | bhagavat अध्याय 11.28: ज्ञान-योग । bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एवं स्फुटं ब्रह्मविवेकहेतुभि:
परापवादेन विशारदेन ।
छित्त्वात्मसन्देहमुपारमेत
स्वानन्दतुष्टोऽखिलकामुकेभ्य: ॥ २३ ॥
अनुवाद
इस प्रकार, विवेकपूर्ण ढंग से परब्रह्म की अनूठी स्थिति को समझते हुए, मनुष्य को पदार्थ के साथ अपनी गलत पहचान का कुशलतापूर्वक खंडन करना चाहिए और आत्मा की पहचान के बारे में सभी संदेहों को दूर करना चाहिए। आत्मा के स्वाभाविक आनंद से संतुष्ट होकर मनुष्य को भौतिक इंद्रियों के वासनापूर्ण कार्यों से बचना चाहिए।
Thus, having understood the unique position of the Supreme Being through discerning reasoning, man should skillfully refute his wrong identification with matter and shatter all doubts regarding the identity of the soul. Being satisfied with the natural bliss of the soul, man should stay away from the sensual activities of the physical senses.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥