अविद्यमानोऽप्यवभासते यो
वैकारिको राजससर्ग एष: ।
ब्रह्म स्वयंज्योतिरतो विभाति
ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २२ ॥
अनुवाद
वास्तव में अस्तित्वहीन ही होने पर भी, यह रजोगुण से उद्भूत परिवर्तनों की अभिव्यक्ति सत्य प्रतीत होती है क्योंकि स्वयं आविर्भूत, स्वयं प्रकाशित परब्रह्म स्वयं को इंद्रियों के विविध प्रकार, इंद्रिय-विषयों, मन और प्रकृति के तत्वों के रूप में व्यक्त करता है।
Though not actually existing, this manifestation of transformations resulting from the mode of passion appears to be true because the self-manifested, self-luminous Supreme Brahman manifests Himself as the various senses, sense-objects, mind and elements of the body.
तात्पर्य
समूहात्मक भौतिक प्रकृति, प्रधान, मूल रूप से अविशिष्ट और निष्क्रिय है, परंतु बाद में यह परिवर्तन से गुजरती है जब सर्वोच्च भगवान, अपने समय एजेंट के माध्यम से, इस पर ध्यान केंद्रित करते हैं और जुनून के तरीके को सक्रिय करते हैं। इस प्रकार भौतिक परिवर्तन होता है और भगवान की हीन ऊर्जा के रूप में प्रदर्शित होता है। इसके विपरीत, सर्वोच्च भगवान के व्यक्तिगत निवास में शाश्वत विविधता होती है, जो परम सत्य का आत्म-प्रकाशित, आंतरिक वैभव है और यह भौतिक निर्माण, परिवर्तन या विनाश के अधीन नहीं है। इस तरह भौतिक दुनिया एक ही समय में परम सत्य से अलग और उसी के साथ एक है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥