श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.28.20 
विज्ञानमेतत्‍त्रियवस्थमङ्ग
गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।
समन्वयेन व्यतिरेकतश्च
येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
भौतिक मन चेतना की तीन अवस्थाओं - जागृति, नींद और गहरी नींद में प्रकट होता है, जो प्रकृति के तीन गुणों के उत्पाद हैं। मन आगे तीन अलग-अलग भूमिकाओं में प्रकट होता है - देखने वाला, देखा गया और धारणा का नियामक। इस प्रकार मन इन तीन गुना पदनामों में विविध रूप से प्रकट होता है। लेकिन यह चौथा कारक है, जो इस सब से अलग मौजूद है, जो अकेला परम सत्य का गठन करता है।
 
The physical mind manifests itself in three states of consciousness—waking, sleeping and deep sleep—which are generated by the three modes of nature. The mind then manifests itself in three different roles—as the observer, the observed and the regulator of perception. In this way the mind continuously manifests itself in various forms in the three states. But a fourth element different from all these also exists and that is the Supreme Brahman.
तात्पर्य
जैसा कि कठ उपनिषद (2.2.15) में कहा गया है, तं एव भान्तम अनुभाति सर्वं / तस्य भासा सर्वम् इदं विभाति: "उस भगवान के मूल प्रकाश का अनुसरण करते हुए, सब कुछ अपनी चमक बिखेरता है; उसका प्रकाश पूरे ब्रह्मांड को रोशन करता है।" जैसा कि वर्णित है, संपूर्ण धारणा, ज्ञान और संवेदनशीलता की श्रेणी परमेश्वर व्यक्तित्व की धारणा, ज्ञान और संवेदनशीलता का एक छोटा विस्तार मात्र हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)