श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  11.28.2 
परस्वभावकर्माणि य: प्रशंसति निन्दति ।
स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशत: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के गुणों और व्यवहार की प्रशंसा या आलोचना करता रहता है, वह मायावी भ्रमों में उलझकर शीघ्र ही अपने सर्वोत्तम हितों से विचलित हो जाता है।
 
Anyone who praises or criticizes the qualities and behavior of others will soon be entangled in illusory dualities and go astray from his own best interests.
तात्पर्य
एक वातानुकूलित आत्मा भौतिक प्रकृति पर अधिकार करने की इच्छा रखती है और इस प्रकार एक अन्य वातानुकूलित आत्मा की आलोचना करती है जिसे वह निम्नतर मानता है। इसी तरह, कोई श्रेष्ठ भौतिकवादी की प्रशंसा करता है क्योंकि वह उस श्रेष्ठ स्थान की आकांक्षा करता है, जिसमें वह दूसरों पर प्रभुत्व कर सकता है। अन्य भौतिकवादी लोगों की प्रशंसा करना और उनकी आलोचना करना इस प्रकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अन्य जीवों से ईर्ष्या पर आधारित है और व्यक्ति को स्व-अर्थ, अपने वास्तविक स्वार्थ, कृष्ण चेतना से गिरने का कारण बनता है।

"असत्य अभिनिवेशत:" शब्द, "अस्थायी, या असत्य में अवशोषण द्वारा," संकेत देते हैं कि किसी को भौतिक द्वंद्व की अवधारणा को नहीं अपनाना चाहिए और अन्य भौतिकवादी व्यक्तियों की प्रशंसा या आलोचना नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय, व्यक्ति को सर्वोच्च भगवान के शुद्ध भक्तों की प्रशंसा करनी चाहिए और भगवान के व्यक्तित्व के प्रति विद्रोह की मानसिकता की आलोचना करनी चाहिए, जिसके द्वारा व्यक्ति एक गैर-भक्त बन जाता है। किसी को निम्न श्रेणी के भौतिकवादी की आलोचना नहीं करनी चाहिए, यह सोचकर कि उच्च श्रेणी का भौतिकवादी अच्छा है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक के बीच अंतर करना चाहिए और भौतिक मंच पर अच्छे और बुरे में तल्लीन नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक ईमानदार नागरिक नागरिक स्वतंत्रता के जीवन और कारावास के जीवन के बीच अंतर करता है, जबकि एक मूर्ख कैदी आरामदायक और असुविधाजनक जेल की कोठरियों के बीच अंतर करता है। जैसे एक स्वतंत्र नागरिक के लिए जेल में कोई भी स्थिति अस्वीकार्य होती है, उसी तरह एक मुक्त, कृष्णभावनाभावित भक्त के लिए कोई भी भौतिक स्थिति अनुपयुक्त होती है।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर संकेत देते हैं कि वातानुकूलित आत्माओं को भौतिकवादी भेदों से अलग करने की कोशिश करने के बजाय, किसी को उन्हें भगवान के पवित्र नामों का जाप करने और भगवान चैतन्य के संकीर्तन आंदोलन का प्रचार करने के लिए एक साथ लाना चाहिए। एक गैर-भक्त, या यहाँ तक कि एक ईर्ष्यालु तृतीय श्रेणी का भक्त, ईश्वर के प्रेम के मंच पर लोगों को एकजुट करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है। इसके बजाय, वह अनावश्यक रूप से उन्हें भौतिक भेदों जैसे "साम्यवादी", "पूंजीवादी", "काला", "सफेद", "अमीर", "गरीब", "उदार", "रूढ़िवादी" आदि पर जोर देकर अलग करता है। भौतिक जीवन हमेशा अपूर्ण होता है, अंत में अज्ञान और निराशाजनक से भरा होता है। अज्ञान की उच्च और निम्न विशेषताओं की प्रशंसा करने और आलोचना करने के बजाय, व्यक्ति को कृष्ण चेतना में, अनंत काल, आनंद और ज्ञान के आध्यात्मिक मंच पर तल्लीन होना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)