"असत्य अभिनिवेशत:" शब्द, "अस्थायी, या असत्य में अवशोषण द्वारा," संकेत देते हैं कि किसी को भौतिक द्वंद्व की अवधारणा को नहीं अपनाना चाहिए और अन्य भौतिकवादी व्यक्तियों की प्रशंसा या आलोचना नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय, व्यक्ति को सर्वोच्च भगवान के शुद्ध भक्तों की प्रशंसा करनी चाहिए और भगवान के व्यक्तित्व के प्रति विद्रोह की मानसिकता की आलोचना करनी चाहिए, जिसके द्वारा व्यक्ति एक गैर-भक्त बन जाता है। किसी को निम्न श्रेणी के भौतिकवादी की आलोचना नहीं करनी चाहिए, यह सोचकर कि उच्च श्रेणी का भौतिकवादी अच्छा है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक के बीच अंतर करना चाहिए और भौतिक मंच पर अच्छे और बुरे में तल्लीन नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक ईमानदार नागरिक नागरिक स्वतंत्रता के जीवन और कारावास के जीवन के बीच अंतर करता है, जबकि एक मूर्ख कैदी आरामदायक और असुविधाजनक जेल की कोठरियों के बीच अंतर करता है। जैसे एक स्वतंत्र नागरिक के लिए जेल में कोई भी स्थिति अस्वीकार्य होती है, उसी तरह एक मुक्त, कृष्णभावनाभावित भक्त के लिए कोई भी भौतिक स्थिति अनुपयुक्त होती है।
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर संकेत देते हैं कि वातानुकूलित आत्माओं को भौतिकवादी भेदों से अलग करने की कोशिश करने के बजाय, किसी को उन्हें भगवान के पवित्र नामों का जाप करने और भगवान चैतन्य के संकीर्तन आंदोलन का प्रचार करने के लिए एक साथ लाना चाहिए। एक गैर-भक्त, या यहाँ तक कि एक ईर्ष्यालु तृतीय श्रेणी का भक्त, ईश्वर के प्रेम के मंच पर लोगों को एकजुट करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है। इसके बजाय, वह अनावश्यक रूप से उन्हें भौतिक भेदों जैसे "साम्यवादी", "पूंजीवादी", "काला", "सफेद", "अमीर", "गरीब", "उदार", "रूढ़िवादी" आदि पर जोर देकर अलग करता है। भौतिक जीवन हमेशा अपूर्ण होता है, अंत में अज्ञान और निराशाजनक से भरा होता है। अज्ञान की उच्च और निम्न विशेषताओं की प्रशंसा करने और आलोचना करने के बजाय, व्यक्ति को कृष्ण चेतना में, अनंत काल, आनंद और ज्ञान के आध्यात्मिक मंच पर तल्लीन होना चाहिए।
