यद्यपि मिथ्या अहंकार का कोई आधार नहीं है फिर भी अनेक रूपों में देखा जाता है जैसे-मन, वाणी, प्राण और शरीर के कार्यों के रूप में। किन्तु प्रामाणिक गुरु के ध्यान से तीव्र दिव्य ज्ञान रूपी तलवार से एक बुद्धिमान ऋषि इस मिथ्या पहचान को काटकर इस भौतिक दुनिया से पूर्ण मुक्त होकर वास करता है।
Though the false ego has no real basis, it is seen in many forms—such as the actions of the mind, speech, life, and body. But with the sword of divine knowledge sharpened by worship of the bona fide Guru, the sincere sadhu cuts away this false identity and lives in this world free from all material attachment.
तात्पर्य
"बहु-रूप-रूपितम" शब्द, "अनेक रूपों में माना जाता है," यह भी बताता है कि मिथ्या अहंकार का प्रकटीकरण इस विश्वास में निहित है कि कोई देवता, महान व्यक्ति, सुंदर महिला, उत्पीड़ित कार्यकर्ता, बाघ, पक्षी, कीट इत्यादि है। मिथ्या अहंकार के प्रभाव से, शुद्ध आत्मा कुछ भौतिक आवरणों को अपने अंतिम स्वरूप के रूप में स्वीकार करती है, लेकिन इस श्लोक में वर्णित प्रक्रिया द्वारा ऐसी अज्ञानता को दूर किया जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥