जो मनुष्य अपने शरीर, इन्द्रियों, श्वास और मन से अपनी पहचान करता है और इन आवरणों में रहता है, वह अपने ही भौतिक गुणों और कर्मों का रूप धारण करता है। वह समग्र भौतिक ऊर्जा के सापेक्ष अलग-अलग उपाधियाँ प्राप्त करता है और इस तरह, सर्वोच्च समय के सख्त नियंत्रण में, उसे सांसारिक अस्तित्व में इधर-उधर दौड़ना पड़ता है।
The living entity who wrongly identifies himself with his body, senses, life and mind and who lives within these coverings assumes the form of his own conditioned material modes and karma. He assumes various titles relative to the total material devotion and is thus forced to run about in samsara under the strict control of supreme time.
तात्पर्य
असत्य अहंकार, जो जीवित इकाई को भौतिक जीवन को कष्ट देता है, यहां भौतिक शरीर, इन्द्रियों, जीवन वायु और मन के साथ भ्रामक पहचान के रूप में विस्तार से वर्णित है। काल शब्द सीधे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को संदर्भित करता है, जो सशर्त आत्माओं पर समय के सीमित खंडों को थोपते हैं, उन्हें प्रकृति के नियमों के तहत कसकर बांधते रहते हैं। मुक्ति एक निःसार अनुभव नहीं है; मुक्ति भगवान के व्यक्तित्व के सहयोग से किसी के शाश्वत शरीर, इंद्रियों, मन और बुद्धि की प्राप्ति है। हम झूठे अहंकार के संदूषण से मुक्त, अपने शाश्वत, मुक्त व्यक्तित्व को पुनर्जीवित कर सकते हैं, कृष्ण चेतना में प्रभु की प्रेममयी सेवा के लिए खुद को समर्पित करके। जब शुद्ध आत्मा झूठे अहंकार को स्वीकार करती है, तो उसे भौतिक कष्ट से गुजरना पड़ता है। शुद्ध कृष्ण चेतना में स्वयं को भगवान कृष्ण का शाश्वत सेवक होने का स्वीकार करने से स्वतः ही झूठे अहंकार पर विजय प्राप्त करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥