श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  11.28.15 
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादय: ।
अहङ्कारस्य द‍ृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नात्मन: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
शोक, खुशी, डर, गुस्सा, लालच, मोह, तड़प, जन्म और मौत, ये सब मिथ्या अहंकार के अनुभव हैं, शुद्ध आत्मा के नहीं।
 
Grief, joy, fear, anger, greed, attachment, desire, birth and death are experiences of the false ego, not of the pure Self.
तात्पर्य
अहंकार आत्मा का सूक्ष्म भौतिक मन और स्थूल भौतिक शरीर के साथ भ्रमपूर्ण अहं है। इस भ्रांतिपूर्ण अहं के कारण, जीव खोई हुई चीजों के लिए शोक करता है, प्राप्त की हुई चीजों पर खुशी मनाता है, अशुभ चीजों से डरता है, अपनी इच्छाओं की पूर्ति न होने पर क्रोधित होता है, और इंद्रिय तृप्ति के लिए लालची होता है। और इस तरह, इस तरह के झूठे आकर्षण और घृणा से घबराकर, जीव को आगे भौतिक शरीर स्वीकार करना पड़ता है, जिसका अर्थ है कि उसे बार-बार जन्म और मृत्यु से गुजरना पड़ता है। जो आत्म-साक्षात्कारी है, वह जानता है कि ऐसी सभी सांसारिक भावनाओं का शुद्ध आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है, जिसका प्राकृतिक झुकाव प्रभु की प्रेममयी सेवा में संलग्न होना है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)