श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  11.28.13 
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में, जीव भौतिक अस्तित्व से परे है। लेकिन प्रकृति पर अपना प्रभुत्व जताने की उसकी मानसिकता के कारण, उसकी भौतिक अस्तित्व की स्थिति समाप्त नहीं होती है, और सपने की तरह, वह सभी प्रकार के नुकसानों से प्रभावित होता है।
 
In fact, the living entity is beyond the material world. But because of the attitude of dominating the material nature, his material existence does not disappear and he is affected by all kinds of harms, just as happens in a dream.
तात्पर्य
वही श्लोक और अन्य समान श्लोक अन्यत्र श्रीमद्-भागवतम में भी मिलते हैं: तृतीय खण्ड, अध्याय सत्ताईसवाँ, श्लोक 4; चतुर्थ खण्ड, अध्याय उनतीसवाँ, श्लोक 35 और 73; और एकादश खण्ड, अध्याय बाईसवाँ, श्लोक 56। वास्तव में, यह श्लोक भ्रम के सार को पूर्णतः समझाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)