श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.28.12 
श्रीभगवानुवाच
यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मन: सन्निकर्षणम् ।
संसार: फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिन: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
ईश्वर ने कहा: जब तक कि मूर्ख आत्मा भौतिक शरीर, इंद्रियों और जीवन शक्ति की ओर आकर्षित रहती है, उसका भौतिक अस्तित्व बढ़ता रहता है, हालाँकि अंत में यह अर्थहीन है।
 
The Lord said: So long as the foolish soul remains attached to the material body, senses and life, his material existence continues to develop although ultimately it is meaningless.
तात्पर्य
यहाँ शब्द सन्निकर्षणम् इंगित करता है कि शुद्ध आत्मिक जीव स्वेच्छा से स्वयं को भौतिक शरीर से जोड़ता है, इसे सबसे उत्तम व्यवस्था मानते हुए। वास्तव में, स्थिति अपार्थ, व्यर्थ है, जब तक कोई अपनी सन्निहित स्थिति का उपयोग प्रभु की प्रेममयी सेवा में नहीं करता। उस समय किसी का संबंध वास्तव में भगवान कृष्ण के साथ होता है, शरीर के साथ नहीं, जो किसी के उच्च उद्देश्य को निष्पादित करने का एक मात्र साधन बन जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)