श्रीभगवानुवाच
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् ।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥
अनुवाद
भगवान ने कहा: मनुष्य को दूसरे व्यक्तियों के बद्ध स्वभाव और कार्यों की न तो प्रशंसा करनी चाहिए और न ही आलोचना करनी चाहिए। इसके बजाय, उसे इस दुनिया को केवल भौतिक प्रकृति और आत्माओं के योग के रूप में देखना चाहिए, जो सभी एक परम सत्य पर आधारित हैं।
The Lord said: One should neither praise nor criticize the conditioned nature and actions of another person. Rather, one should consider this world as a union of nature and consuming souls because they are all dependent on one supreme truth.
तात्पर्य
भौतिक परिस्थितियाँ और कार्यकलाप प्रकृति के गुणों की पारस्परिक क्रिया के अनुसार अच्छे, पथभ्रष्ट या अज्ञानापूर्ण प्रतीत होते हैं। ये गुण प्रभु की माया शक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं, जो स्वयं अपने स्वामी, भगवान से भिन्न नहीं है। इसलिए भगवान का भक्त भौतिक प्रकृति की मायावी, अस्थायी अभिव्यक्तियों से अलग रहता है। साथ ही, वह भौतिक प्रकृति को भगवान की शक्ति के रूप में स्वीकार करता है और इस प्रकार अनिवार्य रूप से वास्तविक मानता है। उदाहरण के लिए, मॉडलिंग क्ले को एक बच्चा बाघ, पुरुष या घरों जैसे विभिन्न चंचल रूपों में आकार देता है। मॉडलिंग क्ले वास्तविक है, जबकि इसके अस्थायी आकार मायावी हैं, वास्तविक बाघ, पुरुष या घर नहीं हैं। इसी तरह, संपूर्ण ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति भगवान के हाथों में मॉडलिंग क्ले की तरह है, जो माया के माध्यम से माया के चमकीले अस्थायी रूपों को आकार देता है, जो उन लोगों के दिमाग को अवशोषित करते हैं जो भगवान के भक्त नहीं हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥