Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 11.27.9: द्विज को चाहिए कि वह अपने आराध्य देव, मुझ परमात्मा को बिना पाखंड के, भक्ति और प्रेम के साथ उपयुक्त सामग्री चढ़ाकर पूजे। उसकी पूजा मेरे अर्चाविग्रह, पृथ्वी, अग्नि, सूर्य, जल या अपने हृदय में प्रकट होने वाले मेरे स्वरूप के लिए की जा सकती है। | bhagavat अध्याय 11.27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश । bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विज: ।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरुं माममायया ॥ ९ ॥
अनुवाद
द्विज को चाहिए कि वह अपने आराध्य देव, मुझ परमात्मा को बिना पाखंड के, भक्ति और प्रेम के साथ उपयुक्त सामग्री चढ़ाकर पूजे। उसकी पूजा मेरे अर्चाविग्रह, पृथ्वी, अग्नि, सूर्य, जल या अपने हृदय में प्रकट होने वाले मेरे स्वरूप के लिए की जा सकती है।
A twice born person should worship me, his deity, without any duality, with loving devotion and with appropriate paraphernalia by worshipping my idol, or he should worship my form appearing on the earth, in fire, in sun, in water or in the heart of the worshipper.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥