श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.27.8 
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुष: ।
यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
अब सावधानीपूर्वक सुनो जबकि मैं बता रहा हूँ कि किस तरह से द्विज पद प्राप्त व्यक्ति संबद्ध वैदिक भेंट के साथ पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ मेरी पूजा करते हैं।
 
Now listen with devotion as I explain how a person who has attained the status of a Dvija should worship Me with devotion by following the relevant Vedic recommendations.
तात्पर्य
स्व-निगमेन पद उन विशेष वैदिक विधियों की ओर इशारा करता है जो किसी सामाजिक और व्यावसायिक स्थितियों के लिए प्रासंगिक हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों समुदायों के सदस्य गायत्री मंत्र में दीक्षा के द्वारा द्विजातिम, दोबार जन्मे हैं, को प्राप्त करते हैं। परंपरागत रूप से, पूर्ण रूप से योग्य ब्राह्मण विद्यार्थियों को आठ साल की आयु में, क्षत्रियों को ग्यारह और वैश्यों को बारह साल की आयु में दीक्षा दी जा सकती है, बशर्ते उचित शर्कें पूर्ण की गई हों। दो बार जन्म लेने के दर्जे को प्राप्त करने के बाद, किसी को ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व की उनके देवता के रूप में निष्ठापूर्वक पूजा करनी चाहिए, जैसा कि प्रभु स्वयं वर्णन करेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)