श्रीभगवानुवाच
न ह्यन्तोऽनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव ।
सङ्क्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वश: ॥ ६ ॥
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे उद्धव, अर्चाविग्रह पूजा करने के लिए इतने सारे वैदिक उपाय हैं कि उनकी कोई गिनती नहीं है, इसलिए मैं इस विषय को तुम्हें संक्षेप में, एक-एक कदम करके समझाऊंगा।
The Lord said: O Uddhava, there are so many Vedic methods for performing Archavigraha worship that they are endless; therefore I will explain this topic to you briefly, one by one.
तात्पर्य
यहाँ शब्द कर्म-काण्ड विभिन्न वैदिक पूजा विधियों को सूचित करता है, जो सर्वोच्च व्यक्तित्व के देवता के रूप में पूजा में परिणत होती हैं। जिस तरह इंद्रियों की तृप्ति और भौतिक त्याग के मार्ग अनगिनत हैं, उसी प्रकार सर्वोच्च व्यक्तित्व के परमानंदमय गुण और उनकी लीला जिसमें वे अपना स्वर्ग बैकुंठ नामक स्थान में रहते हैं, वे भी अनगिनत हैं। भौतिक दुनिया में पवित्रता और शुद्धिकरण के विभिन्न तरीके अंततः स्वयं में समन्वित नहीं किए जा सकते हैं, जब तक कि परम सत्य, भगवान के व्यक्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि उनके बिना यह समझ नहीं आता कि मनुष्य के लिए वास्तव में क्या कर्तव्य है। यद्यपि लगभग सभी मनुष्य विभिन्न पूजा प्रक्रियाओं में लगे हुए हैं, प्रभु अब इस विषय का सारांश देंगे, जिसमें वर्णन किया गया है कि कैसे किसी को अपने देवमूर्ति के रूप में उनकी पूजा करनी चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥