जब भी कोई व्यक्ति मेरे प्रति श्रद्धा रखता है - या तो मेरे देवता के रूप में या अन्य प्रामाणिक अभिव्यक्तियों के रूप में, उसे उस रूप में मेरी पूजा करनी चाहिए। मैं निश्चित रूप से सभी जीवित प्राणियों के भीतर और अपने मूल रूप में भी अलग-अलग मौजूद हूं, क्योंकि मैं सभी की सर्वोच्च आत्मा हूं।
Whenever a person develops faith in Me, whether in My Archa Vigraha form or in other authentic manifestations, he should worship Me in that form. I certainly exist within all created beings and also separately in My original form, for I am the Supersoul of all.
तात्पर्य
भगवान् का पूजन उनके भक्त के विश्वास के अनुसार किया जाता है। देवता के रूप, अर्चा, का विशेष उल्लेख इसलिए किया गया है क्योंकि आध्यात्मिक प्रगति के लिए देवता का पूजन आवश्यक है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि अनुभवहीन व्यक्ति यह सोच सकते हैं कि देवता उनकी इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए है क्योंकि ऊपर से देखने पर देवता संगमरमर या पीतल जैसे बाहरी पदार्थों से बना होता है। पर अधिकृत मंत्रों का जाप करके देवता को स्थापित करने की प्रक्रिया से, परमेश्वर को देवता के रूप में प्रवेश करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। नियमित और निष्ठापूर्वक पूजन से, धीरे-धीरे यह समझ आता है कि देवता स्वयं भगवान् से बिल्कुल भिन्न नहीं है। उस स्तर पर, देवता के पूजन के आधार पर, वैष्णव भक्ति सेवा के दूसरे चरण की ओर बढ़ता है। इस अधिक विकसित चरण में, व्यक्ति भगवान् के अन्य भक्तों से मित्रता करना चाहता है, और जैसे-जैसे वह वैष्णव समुदाय में दृढ़ता से स्थापित होता जाता है, वह सांसारिक जीवन को पूरी तरह से त्याग देता है और धीरे-धीरे कृष्ण चेतना में पूर्ण हो जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥