श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  11.27.44 
उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम ।
मत्कथा: श्रावयन् श‍ृण्वन् मुहूर्तं क्षणिको भवेत् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
अन्य भक्तों के साथ मिलकर गाना, कीर्तन करना और नाचना, मेरी दिव्य लीलाओं का अभिनय करना, मेरी कथाएँ सुनना और सुनाना, भक्त को चाहिए कि कुछ समय के लिए ऐसे उत्सव में लीन हो जाए।
 
The devotee should become absorbed in such celebrations for some time, singing with others, chanting loudly and dancing, enacting My divine pastimes, and listening and narrating stories about Me.
तात्पर्य
परम प्रभु की नियमित उपासना में तल्लीन एक भक्त को कभी-कभी प्रभु के उत्सव-विहारों का कीर्तन और श्रवण, नृत्य और अन्य आनंदोत्सव में मग्न होकर परमानंद में खो जाना चाहिए। 'मुहूर्त' शब्द, "कुछ समय के लिए" इंगित करता है कि किसी भक्त को परमानंद के नाम पर अपने नियमनात्मक सिद्धांतों और प्रभु की सेवा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यद्यपि कोई व्यक्ति कीर्तन, श्रवण और नृत्य में आनंदमय रूप से संलग्न हो सकता है, लेकिन वह प्रभु की विधिवत सेवा के औपचारिकता को त्याग नहीं सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)