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bhagavat 11.27.42: इस तरह से भगवान की यज्ञ की अग्नि में पूजा करने के बाद, भक्त को चाहिए कि भगवान के व्यक्तिगत सहयोगियों को झुककर नमस्कार करे और फिर उन्हें भेंट चढ़ाए। तत्पश्चात, उसे प्रभु के देवता के मूल मंत्र का मन ही मन जाप करना चाहिए और पूर्ण सत्य के रूप में परम पुरुष, नारायण का स्मरण करना चाहिए।   |   bhagavat अध्याय 11.27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.27.42 
अभ्यर्च्याथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत् ।
मूलमन्त्रं जपेद् ब्रह्म स्मरन्नारायणात्मकम् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
इस तरह से भगवान की यज्ञ की अग्नि में पूजा करने के बाद, भक्त को चाहिए कि भगवान के व्यक्तिगत सहयोगियों को झुककर नमस्कार करे और फिर उन्हें भेंट चढ़ाए। तत्पश्चात, उसे प्रभु के देवता के मूल मंत्र का मन ही मन जाप करना चाहिए और पूर्ण सत्य के रूप में परम पुरुष, नारायण का स्मरण करना चाहिए।
 
After worshipping the Lord in the sacrificial fire in this manner, the devotee should bow down and salute the Lord's personal associates and then present them with gifts. Then he should chant the Moola Mantra of the Lord's Archavigraha in his mind and remember the Supreme Being in the form of Lord Narayana.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)