श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  11.27.37 
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि ।
प्रोक्षण्यासाद्य द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम् ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
कुश के पवित्र तृण को भूमि पर बिछाकर और जल छिड़ककर, विधिवत अन्वाधान संस्कार पूर्ण कर लेना चाहिए। तदनंतर, आहुति देने वाली सामग्रियों को नियत रूप से रखना चाहिए और उन्हें छिड़काव पात्र से पवित्र जल से अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद उपासक को अग्नि के मध्य में मेरा ध्यान करना चाहिए।
 
After spreading kusha on the ground and sprinkling water on it, the Anvaadhan should be done according to the prescribed rituals. After that, arrange the things to be offered in the Aahuti and purify them by sprinkling water from the vessel. After this, the worshipper should meditate on me inside the fire.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी उल्लेख करते हैं कि भक्तों को बलि की आग में भीतर में विराजमान परमात्मा के रूप में प्रभु का ध्यान करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)