श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.27.32 
वस्त्र‍ोपवीताभरणपत्रस्रग्गन्धलेपनै: ।
अलङ्कुर्वीत सप्रेम मद्भ‍क्तो मां यथोचितम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात मेरे भक्त को मुझे विधिवत् वस्त्र, जनेऊ, विविध आभूषण, तिलक चिह्न व मालाएँ पहनाकर मेरा श्रृंगार करना चाहिए और मेरे शरीर पर सुगंधित तेल लगाना चाहिए।
 
Then my devotee should adorn me well with clothes, sacred thread, various ornaments, tilak marks and garlands and anoint my body with fragrant oil as per the prescribed method.
तात्पर्य
उद्धरण श्रील श्रीधर स्वामी विष्णु-धर्म उपपुराण में भगवान श्री विष्णु द्वारा अम्बरीष महाराज को दिए गए निर्देशों का वर्णन इस प्रकार करते हैं: "अपने मन को पूरी तरह से देवता में लगाकर आपको सभी अन्य आश्रयों को त्याग देना चाहिए और देवता को अपना घनिष्ठ शुभचिंतक मानना चाहिए। आपको चलते समय, खड़े रहते समय, सोते और खाते समय मानसिक रूप से उनकी पूजा और ध्यान करना चाहिए। आपको देवता को अपने सामने, पीछे, ऊपर, नीचे और दोनों तरफ देखना चाहिए। इस तरह आपको लगातार मेरे देवता रूप को याद रखना चाहिए।" गौतमीय-तंत्र में भगवान की देवता को, यदि संभव हो तो, एक ब्राह्मण सूत्र देने के लिए कहा गया है। इसके अलावा, नरसिंह पुराण में कहा गया है, "यदि कोई भगवान गोविंद को रेशम की तीन स्ट्रैंड वाली एक पीली पवित्र डोरी चढ़ाता है, तो वह वेदांत का विशेषज्ञ बन जाएगा।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)