चन्दनोशीरकर्पूरकुङ्कुमागुरुवासितै: ।
सलिलै: स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥ ३० ॥
स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया ।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभि: ॥ ३१ ॥
अनुवाद
पूजक प्रत्येक दिन, अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार, चन्दन-लेप, उशीर, कपूर, केसर और अगरु से सुगंधित कर, विधिवत तरीके से देवता का स्नान कराये। उसे अनुवाक जोकि स्वर्ण-घर्म कहलाती है, महापुरुष विद्या, पुरुष सूक्त जैसी विभिन्न वैदिक स्तुतियाँ और राजन व रोहिन्य जैसे सामवेद के विभिन्न गीत भी गाने चाहिए।
पूजक प्रत्येक दिन, अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार, चन्दन-लेप, उशीर, कपूर, केसर और अगरु से सुगंधित कर, विधिवत तरीके से देवता का स्नान कराये। उसे अनुवाक जोकि स्वर्ण-घर्म कहलाती है, महापुरुष विद्या, पुरुष सूक्त जैसी विभिन्न वैदिक स्तुतियाँ और राजन व रोहिन्य जैसे सामवेद के विभिन्न गीत भी गाने चाहिए।