श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  11.27.30-31 
चन्दनोशीरकर्पूरकुङ्कुमागुरुवासितै: ।
सलिलै: स्‍नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥ ३० ॥
स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया ।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभि: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
पूजक प्रत्येक दिन, अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार, चन्दन-लेप, उशीर, कपूर, केसर और अगरु से सुगंधित कर, विधिवत तरीके से देवता का स्नान कराये। उसे अनुवाक जोकि स्वर्ण-घर्म कहलाती है, महापुरुष विद्या, पुरुष सूक्त जैसी विभिन्न वैदिक स्तुतियाँ और राजन व रोहिन्य जैसे सामवेद के विभिन्न गीत भी गाने चाहिए।
 
The worshipper should, according to his financial capacity, use water perfumed with sandalwood paste, ushir, camphor, kumkum and aguru to bathe the Deity daily. He should also recite various Vedic hymns such as the anuvakas, called svarna-dharma, the mahapurusha vidya, the purusha sukta and various songs from the Samaveda, such as the rajana and the rohinya.
तात्पर्य
पुरुष-सूक्त प्रार्थना, ओम सहस्र-शीर्ष-पुरुष: सहस्राक्ष: सहस्र-पात से शुरू होकर, ऋग्वेद में निहित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)