श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  11.27.3-4 
नि:सृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानज: ।
पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भव: ॥ ३ ॥
एतद् वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम् ।
श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्‍त्रीशूद्राणां च मानद ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
हे वदान्य प्रभु, अर्चाविग्रह की इस पूजा-विधि के आदेश सर्वप्रथम आपने अपने कमलमुख से दिए। तत्पश्चात्, महान भगवान ब्रह्मा ने अपने पुत्रों, जिनमें भृगु प्रमुख थे, और भगवान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को इस विधि का उपदेश दिया। यह विधि समाज के समस्त व्यवसायिक व आध्यात्मिक समूहों द्वारा स्वीकार की जाती है और उनके लिए उपयुक्त है। इसलिए, मैं महिलाओं और शूद्रों के लिए भी, आपकी अर्चाविग्रह रूप की पूजा को समस्त आध्यात्मिक अभ्यासों में सबसे अनुकूल व लाभकारी मानता हूँ।
 
O Vadanya Prabhu, you first gave the instructions for this method of worship of Archavigraha from your lotus mouth. Then Brahmaji gave it to his sons like Bhrigu and Shivaji gave it to his wife Parvati. This method is accepted by all the varnas and ashramas and is suitable for them. Therefore I consider your worship in the form of Archavigraha to be the most beneficial of all spiritual practices even for women and Shudras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)