श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  11.27.29 
दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून्सुरान् ।
स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभि: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
प्रोक्षण आदि भेंटों से दुर्गा, विनायक, व्यास, विश्वक्सेन, गुरुओं और विविध देवताओं की पूजा करनी चाहिए। ये सभी व्यक्ति भगवान के अर्चा विग्रह की ओर मुख करके अपने-अपने स्थान पर होने चाहिए।
 
One should worship Durga, Vinayaka, Vyasa, Vishvaksena, Gurus and various deities with offerings like prokshana etc. All these persons should be in their respective places facing the Deity of the Lord.
तात्पर्य
श्रील जीवा गोस्वामी के अनुसार, इस श्लोक में बताए गए गणेेश और दुर्गा भौतिक दुनिया में उपस्थित व्यक्तित्व नहीं है, बल्कि वे वैकुण्ठ में भगवान के शाश्वत सहयोगी हैं। इस दुनिया में भगवान शिव के पुत्र गणेश, वित्तीय सफलता प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध हैं, और भगवान शिव की पत्नी देवी दुर्गा, सर्वोच्च भगवान की बाहरी, भ्रामक शक्ति के रूप में प्रसिद्ध हैं। हालांकि, यहां उल्लिखित व्यक्तित्व भगवान के शाश्वत मुक्त सहयोगी हैं जो भौतिक अभिव्यक्ति से परे आध्यात्मिक आकाश में निवास करते हैं। श्रील जीवा गोस्वामी यह साबित करने के लिए विभिन्न वैदिक साहित्यों से उद्धृत करते हैं कि नाम दुर्गा भगवान की आंतरिक शक्ति को भी इंगित कर सकता है, जो उनसे अलग नहीं है। भगवान की बाहरी, या आवरण करने वाली, शक्ति इस मूल दुर्गा से फैलती है। भौतिक दुनिया की दुर्गा, जिसे महा-माया कहा जाता है, जीवों को भ्रमित करने का कार्य करती है। इसलिए एक भक्त को यहां बताई गई दुर्गा की पूजा करने से दूषित होने का भय नहीं होना चाहिए, जिसका भ्रम के समान नाम है, बल्कि भक्त को वैकुण्ठ में सर्वोच्च भगवान के इन शाश्वत सेवकों के प्रति श्रद्धा दिखानी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)