श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  11.27.25-26 
पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान् प्रकल्पयेत् ।
धर्मादिभिश्च नवभि: कल्पयित्वासनं मम ॥ २५ ॥
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम् ।
उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
पूजा करने वाले को चाहिए कि सबसे पहले मेरे आसन को धर्म, ज्ञान, त्याग और ऐश्वर्य के साक्षात् देवताओं से और मेरी नौ आध्यात्मिक शक्तियों से अलंकृत होने की कल्पना करनी चाहिए। उसे भगवान के आसन को आठ पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में मानना चाहिए जो अपने कोश के भीतर केसर के तंतुओं से तेजस्वी है। फिर वेदों और तंत्रों के नियमों का पालन करते हुए उसे मुझे पैर धोने का पानी, मुँह धोने का पानी, अर्घ्य और पूजा की अन्य वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिए। इस विधि से उसे भौतिक सुख और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
 
The worshipper should first imagine that my seat is adorned with the personified deities of Dharma, Gyan, Sacrifice and Aishwarya and with my nine spiritual powers. He should consider the seat of the Lord as an eight-petalled lotus which is effulgent with saffron filaments within its cocoon. Then he should offer me water for washing the feet, water for rinsing the mouth, Arghya and other articles of worship according to the rules of the Vedas and Tantras. By this method he attains both material enjoyment and liberation.
तात्पर्य
श्रीला श्रीधर स्वामी के अनुसार, धर्म, ज्ञान, त्याग और ऐश्वर्य भगवान के बैठने के चबूतरे के पैर हैं और दक्षिण पूर्व से आरंभ करते हुए चारों कोनों में होते हैं। अधर्म, अज्ञान, मोह और दरिद्रता बीच के पैर हैं, और पूर्व से शुरू होकर चारों दिशाओं में खड़े होते हैं। भगवान की नौ शक्तियाँ, या विभूतियाँ, हैं विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्य, ईशाना और अनुग्रहा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)