श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  11.27.24 
तयात्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मय: ।
आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
भक्त उस परमात्मा का ध्यान करते हैं जिसकी उपस्थिति से भक्त का शरीर उसकी अनुभूति के अनुसार अतिभारित हो जाता है। इस तरह भक्त अपनी पूरी शक्ति से भगवान की पूजा करता है और उनमें पूरी तरह से लीन हो जाता है। भगवान की मूर्ति के विभिन्न अंगों का स्पर्श करके और उचित मंत्रों का जाप करके भक्त को परमात्मा को मूर्ति के रूप में आने के लिए आमंत्रित करना चाहिए और फिर मेरी पूजा करनी चाहिए।
 
The devotee meditates on the Supreme Being, whose presence fills the devotee's body more and more according to his feeling. In this way the devotee worships the Lord to the best of his ability and becomes absorbed in Him. By touching the various parts of the Deity and chanting appropriate mantras, the devotee should invite the Supreme Being to come in the form of the Deity and then worship me.
तात्पर्य
भक्त के शरीर में परम भगवान वैसे ही व्याप्त हैं जैसे घर में दीपक की रौशनी फैली होती है। जिस तरह कोई मित्रतापूर्ण भाव से इशारा करके अतिथि को अपने घर में आने का आमंत्रण देता है, उसी तरह देवता के शरीर को स्पर्श करते हुए उपयुक्त मंत्रों का उच्चारण और उत्साहपूर्वक भगवान को देवता के शरीर में प्रवेश करने के लिए आमंत्रित करते हैं। चूंकि देवता और परमात्मा दोनों ही परम भगवान हैं, इसलिए वे अलग नहीं हैं। भगवान का एक रूप तुरंत ही दूसरे रूप में प्रकट हो सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)