श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  11.27.23 
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम ।
अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
अपना शरीर- रूपी क्षेत्र वायु और अग्नि द्वारा पवित्र हो चुका है, उसमें स्थित मेरे सूक्ष्म स्वरूप पर ध्यान लगाओ जो सभी जीवों का स्रोत है। इस क्षण में परमहंस संतों को मेरे उस अंतिम स्वरूप की अनुभूति होती है जो पवित्र ॐ ध्वनि के अंत में आता है।
 
The worshipper should meditate upon My subtle form, which is now situated within the worshipper's body, purified by air and fire, as the source of all beings. This form of the Lord is experienced by the self-realized sages at the end of the sound of the holy syllable Om.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामीजी के अनुसार, प्रणव या ओंकार के पांच अंग हैं : अ, उ, म, नासिक्य बिंदु और नाद। मुक्त आत्माएँ नाद के अंत में भगवान का ध्यान करती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)