तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च ।
प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत् ॥ २१ ॥
अनुवाद
तब उस प्रोक्षणीय पात्र के जल से वह देवता की पूजा के स्थान पर, चढ़ाई जाने वाली भेंटों पर और अपने शरीर पर भी जल छिड़के। तत्पश्चात् वह जल से भरे तीन पात्रों को विभिन्न शुभ वस्तुओं से सजाये।
Then from that Prokshaniya vessel he should sprinkle water on the place where the Deity is being worshipped, where offerings are to be made and also on his own body. After that he should decorate three vessels filled with water with various auspicious objects.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी वेद साहित्य के हवाले देते हुए कहते हैं कि चरण स्नान का पानी बाजरा के बीजों, पानी में घोली गई दूर्वा घास, विष्णुक्रांत फूल व अन्य वस्तुओं को मिलाकर बनाना चाहिए। अर्घ्य के लिए पानी में आठ चीजें शामिल होनी चाहिए - सुगंधित तेल, फूल, बिना टूटे जौ के दाने, छिले हुए जौ के दाने, कुश के अग्र भाग, तिल, राई और दूर्वा घास। घूँट के लिए पानी में चमेली के फूल, लौंग और काक्कोल जामुन मिलना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥