श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.27.20 
कृतन्यास: कृतन्यासां मदर्चां पाणिना मृजेत् ।
कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
भक्त को चाहिए कि अपने शरीर के विभिन्न अंगों को छूकर और मंत्रों का उच्चारण करके उन्हें पवित्र बनाए। उसे मेरे देवता रूप के लिए भी ऐसा ही करना चाहिए और उसके बाद अपने हाथों से देवता पर चढ़े हुए पुराने फूलों और पिछले चढ़ावों के अवशेषों को साफ करना चाहिए। उसे पवित्र कलश (पात्र) और छिड़कने के लिए जल से भरे पात्र को भी उचित रूप से तैयार करना चाहिए।
 
The devotee should purify the various parts of his body by touching them and chanting mantras. He should do the same with my Archavigraha form and then remove with his own hands the old flowers and other offerings made to the Archavigraha. He should also properly prepare the sacred kalasha (vessel) and the vessel containing water for sprinkling.
तात्पर्य
पहले ये जो पूजा-विधान कहा है, उसको करने के पहले अपने गुरुदेव, भगवान और पूज्य व्यक्तियों को नमस्कार करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)